“अजीब दास्तां है ये…” – मीना कुमारी ने स्क्रीन पर मोहब्बत को अमर बना दिया

शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

1960 का दशक — जब सिनेमा में इमोशन, शालीनता और संगीत का स्वर्ण युग था। इसी दौर में आई किशोर साहू की क्लासिक ड्रामा फिल्म ‘दिल अपना और प्रीत पराई’, जहां राजकुमार का गंभीर चेहरा, मीना कुमारी की नम आँखें और नादिरा की जलन भरी मुस्कान ने मोहब्बत को एक मेडिकल मेटाफर में बदल दिया।

कहानी — जब ड्यूटी और दिल में हुआ टकराव

डॉ. सुशील वर्मा (राजकुमार) एक सर्जन हैं, जो अपने परिवार और जिम्मेदारियों में उलझे हैं। उनकी जिंदगी में आती है करुणा (मीना कुमारी) — एक नर्स जो मरीज़ों की तरह उनके दिल के ज़ख्म भी भर देती है। दोनों के बीच एक मूक प्रेमकहानी पनपती है, पर किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर है — क्योंकि सुशील की माँ ने उनकी शादी किसी और से तय कर रखी है — कुसुम (नादिरा) से।

मोहब्बत, मजबूरी और मीना कुमारी की ‘ट्रैजेडी क्वीन’ चमक

मीना कुमारी ने करुणा के किरदार में वो सब दिखाया, जिसे आज भी लोग “ग्लास-आई एक्टिंग” कहते हैं — बिना कुछ कहे, आँखों से पूरे संवाद बोल देना। जब वो सर्जन के घर की देखभाल करती हैं, जब वो दिल टूटने के बाद भी मुस्कुराती हैं — तो लगता है, ये कहानी नहीं, एक कविता चल रही है।

संगीत – जब ‘अजीब दास्तां है ये’ ने इतिहास लिखा

फिल्म का म्यूज़िक शंकर-जयकिशन ने दिया था, और लता मंगेशकर की आवाज़ में “अजीब दास्तां है ये” आज भी बॉलीवुड के एवरग्रीन क्लासिक में गिनी जाती है। ये वही गाना है जिसने 1961 के फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में मुग़ल-ए-आज़म जैसे म्यूज़िक दिग्गज को पछाड़ दिया था। हर धुन, हर शब्द उस दौर की सादगी और दर्द को बखूबी दर्शाता है।

अवार्ड्स और उपलब्धियाँ

  • फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीतकार पुरस्कार – शंकर जयकिशन (विजेता)
  • सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (किशोर साहू) – नामांकित
  • सर्वश्रेष्ठ गीतकार (शैलेन्द्र) – “दिल अपना और प्रीत पराई” के लिए नामांकित

उस दौर की फिल्मों में इतना प्यार था कि डॉक्टर-नर्स की जोड़ी भी इंजेक्शन नहीं, इमोशन देती थी। आज के OTT डॉक्टर तो बस स्टेथोस्कोप से नहीं, सीरिज़ से इलाज करते हैं!

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